मंगलवार, 30 जनवरी 2018

"पंखुड़ियाँ"


        आपको यह ख़ुशख़बरी देते हुए असीम हर्ष से रोमांचित हूँ  कि प्राची डिजिटल पब्लिकेशन की ओर से देशभर के 24 लेखक एवं 24 कहानियां का आयोजन किया गया जिसे "पंखुड़ियाँ" नामक कहानी संग्रह के रूप में 24 जनवरी 2018 को ई-बुक के रूप में पाठकों के लिए ऑनलाइन देश और दुनियाभर के ई बुक स्टोर्स पर उपलब्ध कराया है। 
प्राची डिजिटल पब्लिकेशन का हार्दिक आभार मुझे एक लेखिका के रूप  मान्यता देने के लिए। 
अधिक जानकारी के लिए नीचे दिया  गया लिंक क्लिक करें -

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pankhuriya

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

यह भी है एक बवाल ...... !



जीवन में चढ़ते-घटते 

प्रपंच का बवाल

आज तड़के दर्शन हो गये

फिर से एक बवाल के 

चीख़ती नज़र  आई

रमा बहू सास के तीखे प्रहार से।


कर अनसुनी क़दम ढोकर

बढ़  गया मैं 

सू गली का चौराहा         
                            
किचकिच का शोर 

इकलौता नल

कहें नो मोर..... ,नो मोर...... 

यहां भी थी 

एक जंग की तैयारी

होने वाली थी 

बवाल की मारा-मारी

कौन किसकी सुने

हर नारी थी सब पे भारी। 


बढ़  चला फिर आगे मैं 

जा बैठा  कोने वाली बैंच पर

ले ही रहा था राहत की सांस

उफ़!

यहां भी हो गया  प्रेमी जोड़ों में 

बवाल...!

सोलहवां सावन 

प्यार में डूबा मन

प्रेमी न समझे तो  

दिल के टूटने का 

बड़ा बवाल ....!


बवाल कहां नहीं है

बस में सीट न मिले तो बवाल

पति पसंद की साड़ी न दिलाए

तो बवाल

बच्चों की न सुनो तो बवाल

पूरी सोसायटी ही बवाल है। 


कुछ होते हैं 

हाई-प्रोफाइल बवाल

राजनीति की खुली गलियों में

जूतम-पैज़ार  का  बवाल

होंठों को सिलते

तानाशाह के रुतबे का बवाल

जो अक्सर कर देते हैं

रियाया को हलाल 

कुछ मेरे मन में भी 

व्याप्त हैं  बवाल 

इंसान हूँ 

बात इंसानियत की करता हूँ 

गर बना रहना चाहूँ  इंसान 

तो करूँ  बवाल ?


पर वास्तविकता क्या है

इस बवाल की

ये सारा जीवन-तंत्र ही बवाल है

खो गयी  शान्ति मन की

दौड़ रहा हर इंसान यहां 

युवा दौड़ लगाए नौकरी की

ग़रीब जुगाड़  करे ज़रुरतों की

वास्तव में  ये सबसे बड़ा  है सवाल

सही मायने में 

यह  भी  है  एक  बवाल ...... !
#अनीता लागुरी ( अनु )
 Google image.

शनिवार, 13 जनवरी 2018

जब जला आती हूँ अलाव कहीं...



ये मन

धूं-धूं जलता है 

जब ये मन

तन से रिसते 

ज़ख़्मों के तरल

ओढ़ के गमों के

अनगिनत घाव 

जब जला आती हूँ 

अलाव कहीं

धीमी-धीमी आंच पर

सुलगता है ये मन

उन सपनों की मानिंद

जो आँखें यों  ही

देखती हैं  मेरी

अनगिनत रतजगी

रातों को

ये धूं-धूं  जलता 

ये मेरा मन

पिघलता है 

मोमबत्ती-सा

और यों  ही

गर्म हो उठता है

उस अलाव-सा
,
जिसे छोड़ आई 

थी कहीं..

उस अकेले चांद संग...!



# अनीता लागुरी (अनु)

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

यह मेरी हार है....

            (जीवन पथ पर बढ़ते रहने की सीख देता एक भाई..)




रुक जाओ
मत भागो
मैं नहीं थोपूँगा 
अपनी पराजय तुम पर
यह  मेरी हार है।

मेरे सपनों की 
दम तोड़ती
अट्टालिकाओं के 
ज़मी-दोज़ होने की हार है।

गर कठघरे में खड़ा होगा कोई
तो वो मैं होऊँगा
सादियों से जलता रहा हूँ  मैं
आज भी जलते सूरज का 
तीक्ष्ण प्रहार मैं ही झेलूँगा। 

मेरे भाई... 
कुछ पल ठहर जाओ
सहने को.....  मरने को..... 
कोई एक ही मरेगा
और वो मैं होऊँगा।

इन बची हुई स्मृतियों से
ढक देना ख़ुद  को
और‌ जब 
अंत होगा ज़मीं का
दौड़कर  चढ़ जाना
पश्चिम की ओर
और वापस आकर 
माँ की गोद में 
सर रख कर
सांसों को धीमा करना..!

इन स्मृतियों को वहीं कहीं
कूड़ेदान में डालकर चल देना
बस चलते ही जाना
ये मेरी पराजय 
मैं नहीं थोपूंगा  तुम पर
ये मेरे लिखे शब्दों की हार है
वर्षों से है शापित जीवन  मेरा
आज दफ़न भी हो जाए  तो क्या  ग़म है......?
#अनीता लागुरी (अनु)


सोमवार, 8 जनवरी 2018

उतरन...


दीदी!
क्या गलती थी मेरी
पूछना चाहती हूँ आज
जन्म तुम्हारे बाद हुआ
इसमें मेरा क्या कसूर

बाबा की अँगुली
थामी  तुमने  
तुम्हारी मैंने
हर चीज़ तुम्हारे बाद मिली मुझे
किताबें तुम्हारी
क़लमें तुम्हारी
बस जिल्द  नयी लगा दी जाती
किताबों पर 
तुम्हारे कपड़ों
पर बस गोटें  नई टांक दी जातीं 
झिलमिल वाली
ताकि बालसुलभ मन मेरा
उलझा रहे
रंगीन गोटों की चमक में
खिलौने तुम्हारे
यहां तक कि कभी-कभी
थाली में बची सब्ज़ी
तक तुम डाल दिया करती थी
उफ़ तक करती
क्योंकि स्नेह की अटूट डोर थी दिल में
पर क्यों......?
सुहाग को अपने 
बांध रही हो 

संग मेरे 

ये ना कोई पुरानी किताब है

ना कोई गोटे वाली फ्रॉक 
ये तो ज़िन्दगी है 
दीदी मेरी, यहां भी मिलेगी क्या .....उतरन तुम्हारी...!!!
सजेगी मेरी मांग की लाली
अब तुम्हारे ही सिंदूर से
अपनी शादी का जो जोड़ा
सहेज रखा है तुमने 
उसे  पहनकर  कैसे बैठूँ
मंडप में  संग जीजू  के...... 
साथ लिए फेरों का
सात  वचनों का 
सात जन्म का 
रिश्ता......
तुम तोड़ के कैसे
मुझे जोड़ चलीं 
मैं कठपुतली नहीं
हाथों की तुम्हारी
तक़दीर अपनी लायी हूँ 
माना क़ुदरत ने 
रची साज़िशें आपके साथ 
घर-आंगन की किलकारी  
दी आपके हक़ में
पर मैं ही क्यों  दी.... 
माना हूँ  मैं
छोटी बहना
पर ये उतरन मुझे देना......!!!
# अनीता लागुरी (अनु)

चित्र साभार : गूगल 


गुरुवार, 4 जनवरी 2018

तुम्हारे प्यार में.....

हां तुम्हारे प्यार में डूबा मैं
उस चांद से पूछ बैठता हूँ
क्या तुम्हें नींद नहीं आती
यों  टकटकी लगाए,
क्या देखते हो
या रातों को जागने की
आदत हो  गई
मेरी  तरह..?
या तुम भी कर बैठे प्यार किसी से?
क्या करुं
सर्दी में मुँह से निकलते धुंए को
हवाओं में उड़ाता चला हूँ मैं 

जानता हूँ मैं 
ये  धुआँ नहीं भ्रम है  मेरा
पर फिर भी इस दिल को 

समझाऊँ  कैसे
जो तुम्हारे न होने के अहसास को
पुख़्ता  सबूत बनाता है
जो मेरे  क़दमों को थाम 

आगे बढ़ने से रोक देता है
हाँ सिर्फ़  तुम्हारे प्यार में
बावरा बन.. घूम आता  हूँ
गलियों में , चौराहों पर ...
तो कभी यादों की पगडंडियों पर
थामे हाथ तुम्हारा चल पड़ता  हूँ
उस अनंत क्षितिज की ओर
उस लाल रक्तिम आभा से युक्त
सूरज को छूने
तो कभी तुम्हारी धड़कनों की
धक-धक को सुन उसकी लय में
ख़ुद  को तलाशता
अंजाने ही अर्थविहीन चल पड़ता हूँ
तो कभी छत पर सूखता
तुम्हारा वो नीला-नारंगी दुपट्टा अलबेला
और उससे आती तुम्हारे बदन की वो ख़ुशबू ...!
उसे ढूंढ़ता  न जाने कहां चल पड़ता हूँ  मैं
हां तुम्हारे प्यार में.!
न जाने क्यों
पाबंदियां की परिभाषा भूल गया हूँ
मौसम के चढ़ने-उतरने का 

राग भूल गया हूँ
नभ में उड़ते पंछियों की आज़ादी
भूल गया हूँ मैं 

हाँ  तुम्हारे प्यार में
सुर्ख़ मख़मली एहसासों की नुमाइश कर चला हूँ
समेट लो अपने बाहों में.....
वरना ....न जाने क्या से 
क्या चला हूँ  मैं...!!!
#अनीता लागुरी (अनु)