शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

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एक अंतहीन सफर का झूठा अंत (लघुकथा)
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"अम्मा!
अब नहीं चला जाता है, 
पैर दुखने लगे हैं |"
"अब अरे ऊ... देख सामने हमारे गांव की बस्ती नज़र आ रही है।
बस थोड़ा सब्र कर बिटिया हम पहुंचने ही वाले हैं|"
"क्या अम्मा,  काहे तू झूठ बोल रही है!
"दूई दिन से तोहार ई बात सुन-सुनकर हमार कान पक गईल बा....
ऐ दिदीया!!
काहे तू अम्माँ को झूठी बोले है..!"
"ई मुआँ कोरोना ,नासपीटा,करमजला आ गईल वरना काहे हम लोगन गांव जाते..।"
अम्मा जब बोल रही है, थोड़ी देर में गांव पहुँच जाएँगे तो के केरे तू लपड़झपर कर रही है।"
दे ना ..अम्माँ वो चॉकलेट  तुहार साड़ी में बंधल बा न..ईईईईईई दे ना गो.."
(छोटू को चाकलेट देकर बहला ले  ..लेकिन मुझे)
धप्प से छुटकी ज़मीन पर बैठ गई ...
अब क्या कहे भाई से पिछली बार जब वो अम्मा-अब्बा  
के साथ इस शहर आई थी,
तो पूरे चार दिन ट्रेन में बैठकर आई थी..
और अब कहाँ से एक ही दिन की यात्रा में गांव की बस्ती दिखने लगी वो |
छुटकी समझ गई इस अंतहीन यात्रा का सच |

अनीता लागुरी 'अनु'

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 24 एप्रिल 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. अंतहीन यात्रा का सच!!!
    सच में ये पैदल यात्रा भी बड़ी विकट रही सोचकर मन मर सा जाता है
    समसामयिक सार्थक हृदयस्पर्शी सृजन ।

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  3. मन बींधती आपकी यह कहानी बहुत सारे प्रश्न छोड़ गयी।
    आपकी लेखनी में धार है अनु समय समय पर तेज़ करती रहिये।
    बहुत अच्छा लिखती हैं आप।

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  4. आदरणीया/आदरणीय आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर( 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-३ हेतु नामित की गयी है। )

    'बुधवार' २९ अप्रैल २०२० को साप्ताहिक 'बुधवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य"

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    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।


    आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

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  5. वाह! मार्मिक कथा।
    बहुत खूब लिखा आपने आदरणीया दीदी जी।
    इन पैदल यात्रियों की व्यथा कथा को उचित प्रकार प्रस्तुत किया आपने।
    उत्तम🙏🙏
    सादर प्रणाम।

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