गुरुवार, 30 जनवरी 2020

ऐ जिंदगी तेरे हर बात से डर लगता है..


                                      .......
दूर निकल आई हूँ, सब कुछ छोड़ कर
अब दुआएं बद्दुआऐं मेरा पीछा नहीं करती
लेकिन ना जाने फिर भी क्यूँ
ऐ ज़िंदगी तेरी हर बात से डर लगता है

तेरे दिए हर ज़ख्म
उन जख्मों से रिश्ते दर्द के लावे
और उन जख्मों से इतर खिलखिलाती मेरी हँसी
पल को भूल भी जाऊँ मगर फिर भी
ऐ ज़िदगी तेरी हर बात से डर लगता है

तू कब रुला दे
कब हँसा दे
ना जाने तू कब क्या कर दे
तेरे हर मजाक से डर लगता है

सवालों के घेरे बनाकर
तू तालियाँ बहुत बजाती है
जो निकल भी आउँ छटपटा कर
तू दूजी लिए खड़ी रहती है
ऐ ज़िंदगी तेरे हर किरदार से डर लगता है

चलो माना तू हंसने के मौके भी देती है
मगर समंदर कब कश्तियों को
बिना भिंगोए पार जाने देती है

याद है तुझे
तूने कहा था मुझसे
चल आ सरपट दौड़ लगाते हैं
मैं वही लाइन में खड़ी रह गई
तू जीत करके मुझसे दूर हो गई
ऐ ज़िंदगी तेरी इन चालाकियों से भी डर लगता है

सुकून की तलाश में
छत बनाया था मैंने
टपकती बारिश की बूंदों ने
सर से पाँव तक नहला दिया

तू यकीनन उड़ा ले मजाक मेरा
या गिरा दे रास्तों पर मुझे
पर फिर भी उठ खड़ी  होऊंगी
और  पूछूंगी तुमसे बस तू हार गया

पर हाँ तेरे चंद सवालों से अब भी डर लगता है
सब कुछ हासिल करने के फेर में
अस्तित्व ने मेरे मुझको नकार दिया
मुस्कुराहटे बनती रही चेहरे में मगर
तुमने वह नकाब भी उतार दिया

कहने को तो
दम भरा करती थी
तेरी चुनौतियों से जिंदगी बदल दूंगी
पर तेरे झमेलों ने लपेटा मुझे ऐसा
रोटी कपड़ा मकान इन्हीं में सिमट गई
ऐ ज़िदगी तेरे हर वार से डर लगता है
🍁🍂🍁🍂🍁🍂🍁🍂

अनीता लागुरी"अनु"

4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (31-01-2020) को "ऐ जिंदगी तेरी हर बात से डर लगता है"(चर्चा अंक - 3597) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है 
    ….
    अनीता लागुरी 'अनु '

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  2. जिंदगी पर खास फलसफा ।
    अनुपम सृजन।
    वैसे तो नहीं डरती किसी शै से मैं कभी
    फिर भी ए जिन्दगी तूझ से डर लगता है।
    बहुत खूब।

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  3. चलो माना तू हंसने के मौके भी देती है
    मगर समंदर कब कश्तियों को
    बिना भिंगोए पार जाने देती है

    बहुत ही सुंदर सृजन अनु जी ,सादर स्नेह

    जवाब देंहटाएं

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