शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

आरे के सोते हुए जंगल...

रात्रि का दूसरा पहर,
कुछ पेड़ ऊँघ रहे थे
कुछ मेरी तरह
शहर का शोर सुन रहे थे
कि पदचापों की आती लय ताल ने
कानों में मेरे,
पंछियों का क्रंदन उड़ेल दिया.....

तभी देखा अँधेरों में
चमकते दाँतों के बीच,
राक्षसी हँसी से लबरेज़ दानवों को
जो कर रहे थे प्रहार हम पर
काट रहे थे हमारे हाथों को
पैरों को और गले को
चीख़ें हमारी अनसुनी कर.....

धड़ाधड़ प्रहार पर प्रहार कर
आरे के जंगल को काट डाला आरियों से
क्यों हमारे अस्तित्व को
पलभर में नकार दिया
क्यों मुख्यधारा में लाने को 
हमें काट दिया.....

विकास उन्नति के लिये
हमारी ही बलि क्यों..?
क्या तुम नही जानते..?
सालों लगते हैं हमें सघन होने में,
यूँ ही एक दिन में बड़े नहीं हो जाते है.!!
सिर्फ़ एक पेड़ नहीं हम
तुम्हारे अंदर की  श्वास-गति है..!!

काट जो रहे हो विकास के नाम पर,
साँसों को अपनी ख़ुद बंधक बना रहे हो
आहह....!!!
लो मुझे भी काट दिया..!
अपने  ही जल ,जंगल ज़मीन से
अलग किया..!
पर याद रखना विकास के नाम पर
हमारी जड़ों को उखाड़ फेंकने वालो....
साँसों को जब तरसोगे एक दिन
रुदन हमारा याद आएगा..!
( कुछ दिनों पहले मुंबई में मेट्रो सेड के लिए रातों-रात काटे गए ,आरे के  जंगल , जहां कई हजारों पेड़ों को रात्रि के मध्य समय में काट दिया गया उसी घटना से प्रेरित होकर  ये रचना लिखी मैंने)

 #अनीता लागुरी 'अनु'
(चित्र साभार ..google से)

16 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद संवेदनशील मार्मिक और कटु अभिव्यक्ति अनु.."पर्यावरण के प्रति हमारी संवेदनहीनता एक दिन हमारे ही विनाश का कारण बनेगी" यह चेतावनी काश कि स्वार्थी मनुष्य समझ पाते।
    बधाई एक सार्थक एवं सराहनीय सृजन के लिए।

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    1. .. जी श्वेता दी सही कहा आपने पर्यावरण के प्रति संवेदनहीनता एक दिन अवश्य ही हमें बेहद कड़ी परिणाम से प्रभावित करेगी ...उस वक्त हमें इन पेड़ों के काटे जाने का सख्त अफसोस होगा.. बहुत-बहुत धन्यवाद आपने अपने विचार रखें

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०२ -११ -२०१९ ) को "सोच ज़माने की "(चर्चा अंक -३५०७) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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    1. .. जी निमंत्रण के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद मैं जरूर आउंगी

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  4. आपकी संवेदनशीलता अनुकरणीय है। शुभकामनाएं स्वीकार करें ।

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  5. पर्यावरण से जुड़ी रचनाएं मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही है और आरे के जंगल के काटे जाने की घटना वास्तव में बहुत ही दुखदाई है.. रातों रात इतने सारे पेड़ों को कट जाना हम जैसे पर्यावरण विदों के लिए बहुत ही विचलित कर देने वाली घटना सिद्ध हुई इस विषय पर आपने थोड़ी देर से ही सही लेकिन एक बहुत ही मार्मिक कविता लिख डाली..!!👌👍

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    1. जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आप मेरे ब्लॉग पर आए आपने अपने विचार प्रस्तुत किए वाकई में आरी के जंगलों का कटना ये एक बहुत बड़ी दुखदाई घटना सिद्ध हुई है.. पेड़ों की वजह से हमारा जीवन है अगर हम इन पेड़ों को ही नुकसान पहुंचा देंगे तो हमारे लिए ऑक्सीजन कहां बचेगी बहुत-बहुत धन्यवाद आपने अपने विचार रखें

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  6. एक संवेदनशील सामयिक रचना जो एक ज्वलंत मुद्दे को विचारोत्तेजक किन्तु मार्मिक शैली में प्रस्तुत करते हुए प्रकृति का मानवीकरण करती है। पेड़ों को निर्ममतापूर्वक रात के अँधेरे में काटने और उन्हें बचानेवालों को जेल भेजने वाली सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। अंततः सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पेड़ों की कटाई रुकी और पर्यावरणप्रेमी कार्यकर्ताओं को रिहा किया गया।

    विकास के नाम पर पर्यावरण को दांव पर लगाने वाली सरकार निस्संदेह आलोचना की हक़दार है। यह विकास आख़िर किस क़ीमत पर किया जा रहा है इस पर हमें गम्भीरतापूर्वक विचार करने की ज़रूरत है।

    ढेरों बधाइयाँ और असीम शुभकामनाएँ ऐसे ख़ूबसूरत और सोई हुई संवेदना को झकझोरकर जगानेवाली नायाब रचना के लिये। लिखते रहिए।


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  7. बहुत-बहुत धन्यवाद रविंद्र जी इतनी गहराई के साथ आपने अपनी बात रखी जी बिल्कुल सही कहा आपने यह विकास आखिर किस काम की जब जीते जाते हरे भरे पेड़ों को रात भर में काट करके सपाट मैदान तैयार कर दिया जाए.. हमारा अस्तित्व पर्यावरण की वजह से ही संरक्षित है अगर हम पर्यावरण को बिगाड़ देंगे तो आने वाले समय में हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी आप आए अपने अपने विचार रखे जो बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है ....मैं आपका धन्यवाद करती हूं

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  8. मानव जीवन प्रकृति पर आश्रित है। प्रकृति एक विराट शरीर की तरह है। जीव-जन्तु, वृक्ष-वनस्पति, नदी-पहाड़ आदि उसके अंग-प्रत्यंग हैं। इनके परस्पर सहयोग से यह वृहद शरीर स्वस्थ और सन्तुलित है। जिस प्रकार मानव शरीर के किसी एक अंग में खराबी आ जाने से पूरे शरीर के कार्य में बाधा पड़ती है, उसी प्रकार प्रकृति के घटकों से छेड़छाड़ करने पर प्रकृति की व्यवस्था भी गड़बड़ा जाती है।

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  9. ... जी धन्यवाद....!! बहुत ही सुंदर तरीके से विश्लेषण करके आपने अपनी बात रखी बिल्कुल सत्य है! कि प्रकृति के घटकों से छेड़छाड़ करने से हमें वाले समय में बहुत ज्यादा नुकसान हो सकता है संसाधनों का दोहन एक निश्चित सीमा तक है सही होता है !किसी भी चीज की अति मनुष्य जीवन पर ही भारी पड़ती है आपने अपने विचार रख कर इस चर्चा को आगे बढ़ाया इसका बहुत-बहुत धन्यवाद🙏

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  10. आपकी इस अति संवेदनशील रचना से मुझे विगत वर्ष की एक घटना याद आ गई, जब मैं मिर्ज़ापुर से औराई जा रहा था अखबार का बंडल लेने और देखा कि मार्ग में स्थित सैकड़ों पेड़ काट दिए गए हैं। जिनमें आम, जामुन और अमरूद के पेड़ की शामिल थेंं। बस से जब जाया करता था तो देखता था कि बच्चे पत्थर फेंक कर इन पेड़ों से फल तोड़ा करते थेंं। मैं बस पकड़ने के लिए शास्त्री पुल के समीप जिस पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा होता था और जिससे गर्मी जाड़े और बरसात में उसके छांव तले स्वयं को सुरक्षित महसूस करता था, वे भी काट दिए गए । आज यात्री गर्मी में तपते हुए यहां खड़े हैं। एक रैन बसेरा बना दिया गया है। लेकिन, वह भी बिना पेड़ प्रचंड गर्मी को सहन नहीं कर पाता है । आखिर जिन पेड़ों ने पत्थर मारने के बदले ग्रामीण बच्चों को मीठे फल दिये। जिन्होंने हमें छांव दिया। उनका क्या कसूर है। मानव को इसका दंड प्रकृति एक दिन अवश्य देगी।

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