रविवार, 19 नवंबर 2017

भारतीय भीड़ तंत्र..(लेख)

भारतीय भीड़ तंत्र ...

       आए दिन आजकल हम सुनते हैं कि भीड़ ने फलाना  व्यक्ति को मार डाला। भीड़ ने छोटी- सी बात पर मासूम की पिटाई कर दी...... या फिर भीड़ ने धर्म के नाम पर झूठ-मूठ का अच्छे खासे माहौल को अव्यवस्थित कर दिया। अक्सर आप भी सुनते होंगे कि भीड़ ने ये किया वो किया पर क्या वहां मौजूद लोगों का हुजूम वाकई में भीड़ होती है  ? संवेदनहीन मरे हुए लोगों का हुजूम .........जो पल भर में अपने अंदर का सारा गुस्सा, कुंठा सब कुछ किसी इंसान पर निकाल देता  है!        
          मैंने इस बारे में काफी हाथ- पैर मारे फिर‌ इस निष्कर्ष  पर आई  कि उस भीड़ में  जो लोग अपने हाथ- पैर चलाते हैं  उनमें कई ऐसे लोग होते हैं...... जो उस दिन अपने घर से झगड़ा करके निकले हों...  ये  कुछ लोग ऐसे भी होते हैं  जिनकी जेबें  ख़ाली  होती हैं  ..........    अपने बच्चे अपने पिता या किसी के लिए दवाइयां या उनकी कोई भी जरूरत इत्यादि पूरी करने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं होते हो...........या कॉलेज यूनिवर्सिटी के वो टॉपर , जो डिग्रियां का टोटा अपने बगल में बांधे कंपनियों के चक्कर लगाया करते हैं।   और हर जगह से उन्हें निराशा मिलती है । ये सभी ज्यादातर बस स्टॉप ,चाय वाले की दुकान, या ठेले पर बैठे मिल जायेंगे..... इनमें  से ऐसे कई लोग होते हैं जो अपनी पारिवारिक परेशानियों से घिरे होते है  और ऐसे भी लोग होते हैं जिन्होंने सुबह से शायद  कुछ ना खाया हो या जिनके बॉस ने सरेआम उन्हें डांटा..हो.  दरअसल भीड़ इन सबका एक मिक्सर होता है । उनके अंदर की मानसिकता भले ही ना दिखे लेकिन जब वे  किसी को पीटते हैं तो यकीनन उनके अंदर यही चलता है कि हां ये मेरा बॉस है , ये वो पैसे हैं  जो मैं आज कमा नहीं पाया ........क्या ये मेरी रोटी है, जो मैं आज खा नहीं पाया।  सबके अंदर चलने वाला एक परेशानियों कुंठाओं का एक झंझावात होता है । यह  भीड़ वो भले ही सड़क पर किसी घायल व्यक्ति को अस्पताल न पहुंचाएं या किसी मजबूर की मदद न करे  परंतु जब सवाल किसी को पीटने का आता है तो न  जाने कहां से Superman वाली ताकत आ जाती है .........और ये लोग बस शुरू हो जाते हैं अपने अंदर का frustration निकालने को।   उस भीड़ के अंदर का मानसिक अंतर्द्वंद जो मौका पड़ने पर किसी इंसान की गलती पर उबल पड़ता है ।............. और वह बेचारा इंसान बेमौत मारा जाता है या बुरी तरह घायल हो जाता है ..........इसलिए किसी भीड़ के पल्ले नहीं पढ़ना चाहिए।  अपना प्रयास होना चाहिए कि अगर आप ऐसे किसी मुसीबत में पड़ रहे हैं तब   यह आपकी गलती भारी पड़ सकती है। ..........तो प्रयास कीजिए कि आप वहां से जितनी जल्दी हो सके दूर हट जाएँ  क्योंकि अब इंसानों की शकल में भेड़िये घूमते हैं । ये सरे-आम कत्ल भी कर सकते हैं। सरेआम आपकी इज्जत भी लूट सकते हैं ! क्योंकि वो जानते हैं वो एक भीड़ हैं  कोई एक इंसान नहीं।  हर मारने वाला कौन है नहीं  पता..!..............मतलब ये कुछ भी कर सकते हैं । इस भीड़ का कोई धर्म, कोई ईमान नहीं  होता है. दर असल ये होते हैं सिर्फ कुछ लबादा ओढ़े इंसानी शक्ल और इनके अंदर क्या है..! यह क्या चल रहा है ।
शायद ही  किसी को समझ आए.....!
अनु

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (29-01-2020) को   "तान वीणा की माता सुना दीजिए"  (चर्चा अंक - 3595)    पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

    जवाब देंहटाएं

  2. बहुत सही कहा आपने ,समाजशास्त्र की अनुसार भीड़ एक अंधी और विवेकहीन लोगो का हुजूम होता हैं ,इनसे बचना ही बेहतर हैं ,
    सुंदर लेख अनु जी ,सादर स्नेह

    जवाब देंहटाएं

रचना पर अपनी प्रतिक्रिया के ज़रिये अपने विचार व्यक्त करने के लिये अपनी टिप्पणी लिखिए।